कश्मीरी पंडितों का पलायन, देश के लोकतंत्र के लिए आभिशाप

यह कैसी विडम्बना है कि किसी एक पूरे जातीय समूह को अपने ही देश में शरणार्थी बनकर रहना पड़े। अपना घर-द्वार, संपत्ति, व्यवसाय आदि छोड़कर देश के अन्य भागों में शरणार्थी शिविरों में कष्टमय जीवन बिताना पड़े। रोजी-रोटी के लिए दर-दर भटकना पड़े। बच्चों की शिक्षा-दीक्षा एवं उनके जीवन के भविष्य को लेकर चिंताएँ सामने खड़ी हों। उसकी खेती-बाड़ी, मकान, दुकान सब कुछ छीन लिया गया हो। सबकुछ होते हुए भी उसके पास कुछ भी न हो। यदि ऐसी परिस्थिति में एक जातीय समुदाय विगत पच्चीस वर्षों से रहने को मजबूर हो तो उसकी मनोदशा को समझा जा सकता है। तब यह प्रश्न उठना अनिवार्य है कि क्या उसके लिए लोकतन्त्र और उसके अंतर्गत अधिकारों की रक्षा के कोई मायने हैं? निश्चित रूप से नहीं। वस्तुतः इन्हीं अधिकारों की रक्षा (पलायन पूर्व की स्थिति की बहाली) के लिए पीड़ित कश्मीरी पंडितों का समुदाय अपील, संपर्क, धरना-प्रदर्शन आदि अनेक माध्यमों से लगातार अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करता रहा है, लेकिन राज्य का सत्ता प्रतिष्ठान उसकी व्यथा को सुनने व समझने को आजतक तैयार नहीं दिखा। अतएव वे अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में रहने को मजबूर हैं क्योंकि वे हिन्दू हैं।
वैसे तो कश्मीर घाटी से पंडितों के पलायन का क्रम 14वीं सदी के पूर्वार्ध में तुर्किस्तान के मंगोल आक्रमणकारी जुल्जू के विनाशलीला के साथ शुरू हुआ। कश्मीर के सातवें कट्टर मुस्लिम शासक सिकन्दर बुतशिकन (1389-1413) ने तो गैर-मुस्लिमों के पूजा स्थलों एवं प्रतिकों को तहस-नहस करते हुए उनकी पूरी आबादी को इस्लाम स्वीकार करने या घाटी छोड़ देने के लिए विवश किया। बहुत सारे कश्मीरी ब्राह्मणों ने इस्लाम नहीं स्वीकार किया और पलायन कर देश के अन्य भागों में चले गए। इसके पश्चात, मुग़ल के बाद अफ़गान बादशाहों के समय बहुत सारे कश्मीरी पंडितों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया और थोड़ी सी आबादी शेष बची। डोगरा शासन काल (1846-1947) के दौरान कश्मीरी पंडितों की कुल आबादी 14 से 15 प्रतिशत के बीच थी जिनमे से 20 प्रतिशत ने 1948 के मुस्लिम दंगे और 1950 के भूमि सुधार कानून आने के बाद घाटी छोड़ दी। वस्तुतः सन 1981 तक कश्मीर में कुल जनसंख्या के केवल 5 प्रतिशत पंडित शेष बचे।
स्वाधीनता प्राप्ति के बाद नब्बे का दशक वह काल-खंड था जिसमे मुस्लिम उग्रवादियों के क्रूरतापूर्ण अत्याचार के कारण कश्मीरी पंडित कश्मीर घाटी छोड़ने को बाध्य हुए। 19 जनवरी 1990 वह काला दिन था जिस दिन जेहादियों ने मस्जिदों से घोषणा की कि कश्मीरी पंडित काफिर हैं, पुरुष तत्काल घाटी छोड़ दें या इस्लाम स्वीकार कर लें अथवा मार दिये जाएंगे। जो घाटी छोड़ने को तैयार हुए उनसे कहा गया कि वे लड़कियों और महिलाओं को नहीं ले जा सकते। पूर्व योजना के तहत कश्मीरी मुसलमानों से कहा गया कि वे पंडितों के घरों की पहचान कर लें ताकि उन्हे मुसलमान बना लिया जाये या मार दिया जाये। फिर शुरू हुआ वीभत्स कत्ले-आम जिसमे हजारों लोग मारे गए। लड़कियों एवं महिलाओं की इज्जत लूटी गई यहाँ तक नाबालिग मासूम बच्चियों के साथ भी अमानवीय तरीके से बलात्कार किया गया । सम्पत्तियों पर कब्जा किया गया। धर्मस्थल तोड़े गए अर्थात धर्मान्ध जेहादियों द्वारा वह सबकुछ किया गया जिसकी कम से कम एक पंथनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक देश में उम्मीद नहीं की जाती। परिणामतः पूरी घाटी से कश्मीरी पंडित पलायन कर गए या मरे गए तथा जम्मू सहित अन्य स्थानों पर शरणार्थी शिविरों में कष्टपूर्ण जीवन बिता रहे हैं। ध्यान रहे कि जिस समय पलायन की ये सब घटनाएँ हो रही थीं उस समय मुफ़्ती मोहम्मद और पंथनिरपेक्षता की स्वयंभू चैम्पियन कांग्रेस पार्टी की सरकार थी। सबकुछ होने दिया क्योंकि दोनों को पंडितों की नहीं बल्कि अपने वोट बैंक की चिंता थी।उनकी आँखों के सामने मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार किया गया कश्मीरी हिन्दुओ का कत्ले आम हो रहा था किन्तु कांग्रेस व् मुफ़्ती मोहम्मद सियासी रोटियां सकते रहे |
विधान सभा चुनाव के बाद जम्मू-कश्मीर में जब न्यूनतम साझा कार्यक्रम के अंतर्गत भाजपा एवं पीडीपी की सरकार बनी तो उम्मीद जगी कि कश्मीरी पंडितों के दिन बहुरेंगे। विगत दिनों मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद जब दिल्ली प्रवास के दौरान गृहमंत्री मंत्री से मिले तो कश्मीरी पंडितों के लिए ‘अलग बस्ती’ (सेपरेट सेटीलमेंट) के बारे में बात हुई और सहमति बनी। जब यासीन मलिक, गिलानी, मसरत आलम जैसे देशद्रोहियों को इसके बारे में पता चला तो उन्होने हँगामा करना शुरू कर दिया और कहा कि जम्मू-कश्मीर को इज़राइल नहीं बनने देंगे। विधानसभा में भी हँगामा हुआ। फिर क्या था, मुफ़्ती ने, गृहमंत्री के साथ हुई सहमति के उलट, अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाते हुए कहा कि न तो सेपरेट सेटीलमेंट नहीं बनने दिया जाएगा और न ही जम्मू-कश्मीर को इज़राइल बनने दिया जाएगा। साथ ही देशद्रोहियों की तरह तर्क दिया कि पंडितों को उनके मूल स्थान पर बसाया जाएगा ताकि कश्मीरियत तथा सह-अस्तित्व का भाव पुनः कायम हो सके। क्या कोई मुफ़्ती की बात पर यकीन करेगा जिसने मसरत जैसे पाकिस्तान-परस्त एवं मदांध जेहादी को पाकिस्तानी झण्डा फहराने और भारत के खिलाफ नारेबाजी करने लिए छोड़ दिया हो, जो मसरत को देशद्रोह की धारा में निरुद्ध करने से आना-कानी करता हो, जो मलिक, गिलानी, शब्बीर शाह व अन्य को गिरफ्तार न करता हो और राज्य में भारत विरोधी कार्यक्रम चलाने और तोड़-फोड़ करने के लिए खुला छोड़ दिया हो? निश्चित रूप से नहीं। ये वही तत्व हैं जिन्होंने 1990 कि घटना को अंजाम दिया।
भाजपा ने सकारात्मक सोच के साथ पीडीपी के साथ सरकार बनाई। सोच थी राज्य की समस्याओं का स्थायी हल निकालेंगे। विकास को आगे बढ़ाते हुए खुशहाली लाएँगे। ऐसा करके कश्मीरियों का दिल जीतेंगे। उन्हे राष्ट्र की मुख्य धारा में लाएँगे। कश्मीरी पंडितों की घर वापसी होगी। लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है क्योंकि मुफ़्ती न्यूनतम साझा कार्यक्रम से इतर अपने वोटरों को संबोधित करने में लगे हुए हैं। उन्हे कश्मीरी पंडितों की चिंता क्यों होने लगी। बीजेपी, शिवसेना आदि के अतिरिक्त एक भी दल पंडितों के बारे में नहीं सोचते हैं क्योंकि उन्हें मुस्लिम वोटों कि चिंता सताये रहती है। उन्हे धारा 370 की चिंता रहती जिसके कारण कश्मीर का विशेष चरित्र बना हुआ है, देश के शेष भाग से कटा हुआ है। कितना विचित्र है कि देश के लेखकों, बुद्धजीवियों, सेक्युलरिस्टों और मानवाधिकारियों को पाकिस्तान-परस्त जेहादियों की चिंता तो सताये जाती है लेकिन कश्मीरी पंडितों के बारे में एक भी शब्द नहीं बोलते हैं। उनके अनुसार यही है सच्ची पंथनिरपेक्षता। उदाहरणार्थ, स्वामी अग्निवेश जैसे समाजसेवी को मसरत आलम राष्ट्रभक्त लगता है लेकिन कश्मीरी पंडित देशद्रोही। तभी तो यासीन मलिक जैसे अलगाववादी के साथ श्रीनगर में अनशन पर बैठकर मसरत का समर्थन करते हैं, कश्मीरी पंडितों के लिए प्रस्तावित कालोनी का विरोध। हो सकता है बीजेपी को जम्मू-कश्मीर के अपने लक्ष्य में जल्द सफलता न मिले। यह भी हो सकता है कि योजना के अनुसार कश्मीरी पंडितों की जल्द घर वापसी न हो सके लेकिन किसी भी तरह से असंभव नहीं है, दुरूह जरूर है। पंडितों की तरफ से भी जल्दीबाजी उचित नहीं क्योंकि अब वे पुरानी स्थिति में कभी नहीं आ सकते। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि गैर-मुस्लिम होने कारण ही उन्हें घाटी से पलायन करना पड़ा था।
कश्मीरी पंडितो का आज भी अपने ही देश में शरणार्थी के रूप में रहना इस देश के लिए व् इस देश के लोकतंत्र के मुंह पर तमाचा है | देश का लोकतंत्र १९९० से खतरे में है क्योकि देश के मूल निवासी जम्मू कश्मीर के मूल निवासी इस देश में शरणार्थी बन कर टेंटो में रह रहे है ये इस देश के लिए सबसे बड़ा खतरा है इस देश के लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है| हमारे ही देश के कुछ लोग रोहिंग्या शर्णार्थियो को देश में बसने के लिए आन्दोलन कर रहे है सरकार का विरोध कर रहे है किन्तु इस देश का दुर्भाग्य ये है के कश्मीरी पंडितो को पुनार्श्थापन के लिए लिए कोई भी आन्दोलन या विरोध नहीं हो रहा है बस कश्मीरी पंडितो के नाम पर राजनितिक रोटियां सेकीं गयी |
आज जरुरत है के आप, मै और इस देश के लोग एकसाथ खड़े हो जाये सडको पर निकल जाये और तब तक घर न लौटे जबतक कश्मीरी पंडित पुनः कश्मीर में बस जाये सरकार ये लिखित में दे की कश्मीरी पंडितो को कश्मीर में पूरी सुरक्षा दी जाएगी | वर्ना इसी तरह कश्मीरी पंडितो के नाम पर सरकार को दोष देम अपने ही घर में बैठ कर बयानबाजी करे, व् केवल देशभक्ति के नाम पर नाटक करते रहे, छोटी-छोटी बातो पर देश के लोकतंत्र पर खतरे कायम करे, फालतू बातो में देश को खतरे में डालते रहे, और कश्मीरी पंडितो को युहीं टेंटो में पड़े रहनी दे |
जागो देशवासियों देश आज फिर पुकार रहा है कश्मीरी पंडित अपने हक़ मांग रहे है, देश के लोकतंत्र को बचने के लिए खड़े हो जाओ, निकलो और तबतक मत रुको जबतक कश्मीरों पंडितो को न्याय न मिल जाये वर्ना तुम्हे कोई हक़ नहीं इस देश की रोटी खाने का, इस देश की हवा लेने का, तुम इस देश के नहीं तो किसी के लिए सगे नहीं, तुम्हारे लिए इस देश का पानी हराम है जब तक कश्मीरी पंडितो को तुम न्याय न दिला सको, अगर सच्चे देशभक्त हो तो निकलो बाहर और कश्मीरी पंडितो को जब तक न्याय न मिले तुम्हे इस देश के संसाधन का उपयोग हराम है उठो और निकलो ----

जवाबदेही, जिम्मेदारी और पारदर्शिता का ढोल पीटने वाले राजनीतिक दल


भारतीय जनता पार्टी देश में भ्रष्टाचार को चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है लेकिन बतौर राजनीतिक पार्टी सूचना का अधिकार (आरटीआई) के दायरे में आना उसे मंजूर नहीं है। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांघी अपनी हर सभा में सूचना का अधिकार(आरटीआई) को लाने की दुहाई देते हैं लेकिन अपनी ही कांग्रेस पार्टी को इसके दायरे से बाहर रखना चाहते हैं। राजनीतिक पार्टियों को सूचना का अधिकार(आरटीआई) के दायरे में लाने के फैसले पर कांग्रेस और भाजपा एक साथ आ गई है।देश को सूचना का अधिकार (आरटीआई) देने का दावा करने वाली कांग्रेस व अन्य सभी राजनीतिक पार्टियों ने इसके दायरे में लाने के केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के फैसले का खुलकर विरोध किया।कांग्रेस ने सीआईसी के इस फैसले को अति क्रांतिकारी करार देते हुए इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर हमला बताया। कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि हम इससे पूरी तरह असहमत है। हमें यह स्वीकार्य नहीं है। अपने विरोध के पीछे उन्होंने दलील दी कि पार्टियां किसी कानून से नहीं बनी हैं। वे सरकारी ग्रांट पर नहीं चलती हैं। आम आदमी की जिंदगी में भी सरकारी सहायता की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि यह लोगों की संस्थाएं हैं, जो अपने सदस्यों के प्रति जवाबदेह हैं। उन्होंने सीआईसी पर निशाना साधते हुए कहा कि कहीं ऐसा न हो कि इस तरह की अति क्रांतिकारिता के चक्कर में हम बहुत बड़ा नुकसान कर बैठें।
जवाबदेही, जिम्मेदारी और पारदर्शिता का ढोल पीटने वाले राजनीतिक दल किस तरह इस सबसे कन्नी काटते हैं, इसका पता केंद्रीय सूचना आयोग के उस फैसले का विरोध करने से हो रहा है जिसके तहत यह व्यवस्था दी गई है कि मान्यता प्राप्त सभी राजनीतिक दल सूचना अधिकार कानून के दायरे में आते हैं। यह फैसला आते ही जिस तरह कांग्रेस, माकपा आम आदमी पार्टी और जनता दल-यू ने विरोध का झंडा उठा लिया है वह हास्यास्पद भी है और हैरान करने वाला भी।हैरानी की बात तो यह है कि भाजपा और स्वयंभू इमानदार पार्टी (आम आदमी पार्टी) भी इस फैसले के खिलाफ इन दलों के साथ खड़ी हो गई है। देश के प्रमुख राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के तहत लाने के केन्द्रीय सूचना आयोग के फैसले पर भाजपा ने जदयू, कांग्रेस आम आदमी पार्टी और माकपा से अलग रुख अपनाते हुए शुरू में कहा था कि वह ऐसे हर नियम, कानून और निर्देश का पालन करेगी जिससे पारदर्शिता मजबूत हो।
उल्लेखनीय है, कि गत दिनों मुख्य सूचना आयुक्त सत्यानंद मिश्रा, सूचना आयुक्त एम एल शर्मा व श्रीमती अन्नपूर्णा दीक्षित की खण्डपीठ ने एक याचिका का निराकरण करते हुए कहा था, कि कांग्रेस,भाजपा, भाकपा, माकपा व बसपा को आरटीआई के दायरे में लाया जाना जाहिए। आयोग ने इन राजनीतिक दलों को चार सप्ताह के भीतर मुख्य जनसूचना अधिकारी नियुक्त करने को भी कहा है। सूचना आयुक्त के इस फैसले का व्यापक विरोध शुरु हो गया है। विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने तो आरटीआई पर ही अंकुश लगाने की वकालत करते हुए कहा कि इसे बेकाबू नहीं होने दिया जा सकता। जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि जब राजनीतिक दलों को निर्देश देने के लिए चुनाव आयोग है तो फिर केंद्रीय सूचना आयोग के दायरे में उन्हें लाने का क्या औचित्य है। उन्होंने कहा कि इस तरह के निर्णय से उन्हें धक्का लगा है और आश्चर्य हुआ है कि देश में यह क्या हो रहा है। राजनीतिक दलों को भी केन्द्रीय सूचना आयोग के तहत काम करना पडेग़ा। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी इस तरह के फैसले के बिलकुल खिलाफ है और सरकार को इसे समाप्त करना होगा। श्री यादव ने कहा कि कोई राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के चयन की तथा आंतरिक बातों की कैसे जानकारी दे सकती है।
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का दिखावा करने वाली और चुनावी मुद्दा बनाकर जनता से वोट मांगने वाली राजनीतिक पार्टियों के खुद के हिसाब देने की बारी आई तो वे डर गए।
आरटीआई के दायरे में आना उसे मंजूर नहीं है। दिलचस्प ये है कि एक-दूसरे को पानी पी-पी कर कोसने वाली कांग्रेस और भाजपा दोनों एक ही पटरी पर आ गई है। कांग्रेस को लग रहा है कि केंद्रीय सूचना आयोग का ये फैसला लोकतंत्र पर चोट है।शुरू में भाजपा सीआईसी (सेंट्रल इन्फर्मेशन कमिशन) के इस फैसले पर कुछ भी खुलकर बोलने से परहेज करती रही लेकिन कांग्रेस ने जोरदार तरीके से विरोध करने के बाद भाजपा का रुख भी वैसा ही है। भाजपा के प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि राजनीतिक पार्टियां चुनाव आयोग के प्रति जिम्मेदार हैं न कि केंद्रीय सूचना आयोग के प्रति। भाजपा ने कहा कि सीआईसी का ये फैसला लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। नकवी ने कहा कि इस फैसले से पार्टियों को अपनी बैठकों के चाय पानी का खर्च, राजनीतिक सभाओं पर आने वाला खर्च और पार्टी की आंतरिक बैठकों की जानकारी देनी होगी। उन्होंने कहा कि इस फैसले से चुनाव आयोग और सूचना आयोग के अधिकारों में टकराव होगा और भ्रम की स्थिति पैदा होगी। जब भी चुनाव आयोग राजनीतिक पार्टियों से जानकारियां मांगता है तो उसे जानकारियां दी जाती हैं लेकिन ये मुमकिन नहीं है कि पार्टियां अपने कार्यालयों में सूचना अधिकारी बैठाएं और रोजाना हजारों आवेदनों पर जानकारियां दें। पार्टियां अगर गड़बड़ करती हैं तो जनता उन्हें सीधे ही सजा सुना देती है। ऐसे में सीआईसी के फैसले को लेकर सरकार को सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए। जेडीयू आम आदमी पार्टी और सीपीआईएम ने भी इस फैसले का विरोध किया है।
दरअसल, राजनीतिक पार्टियों को डर सता रहा है कि आरटीआई के दायरे में आने से उन्हें मिलने वाले फंड को लेकर कई तरह के सवाल पूछे जाएंगे। राजनीतिक पार्टियों को कॉर्पोरेट घरानों से चंदे के नाम पर मोटी रकम मिलती है। हालांकि, 20 हजार से ज्यादा की रकम पर पार्टियों को इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को सूचना देनी होती है। लेकिन ज्यादातर मामलों में चालाकी से पार्टियां 20 हजार से कम की कई किस्तों में पैसा ले रही हैं। ऐसे में पता नहीं चलता है कि किसने कितनी रकम दी है और क्यों दी है। गौरतलब है कि राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने की मांग लंबे समय से हो रही थी लेकिन पार्टियों का तर्क था कि उन्हें दान देने वालों की संख्या लाखों में होती है जिनका पूरा रिकॉर्ड रखना संभव नहीं होता। वैसे भी वे ट्रस्ट की तरह रजिस्टर्ड हैं। राजनीतिक दलों का ये तर्क मुख्य सूचना आयुक्त ने खारिज कर दिया।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई को छोड़कर लगभग सभी राजनीतिक दलों ने खुद को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाये जाने का कड़ा विरोध किया था। हालांकि केंद्रीय सूचना आयोग के फैसले के बाद वे सीधी टिप्पणी करने से बच रहे थे। लेकिन अब कांग्रेस ने सीधे तौर पर इसका विरोध कर दिया है।केंद्रीय सूचना आयोग ने बेहद अहम आदेश में कहा कि राजनीतिक दल सूचना के अधिकार कानून के तहत आते हैं। आयोग ने निर्देश दिया है कि सभी दल, चार हफ्ते के भीतर अपने यहां सूचना अधिकारियों की नियुक्ति करें। कांग्रेस और भाजपा समेत लगभग सभी राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया था।
दरअसल सूचना के अधिकार कानून यानी आरटीआई के तहत अब आम आदमी राजनीतिक दलों से उनका हिसाब किताब मांग सकेगा। आयोग के सामने दाखिल याचिका में कहा गया था कि राजनीतिक दलों को सरकार की तरफ से महंगी जमीन, पार्टी कार्यालय खोलने के लिए दी जाती है। इसके अलावा कई और तरह की सुविधाएं भी वे सरकार से लेते हैं। आम आदमी सिर्फ उनका आयकर रिटर्न ही देख सकता है। अधिकतर राजनीतिक दलों के पैसे का महज 20 फीसदी ही चंदे के जरिये आता है, जिसका वो चुनाव आयोग के सामने खुलासा करते हैं। बाकी की रकम कहां से आती है, इसका कोई हिसाब नहीं है।आयोग के इस फैसले के बाद राजनीतिक दलों को बताना होगा कि उन्हें चंदा कौन दे रहा है।पार्टियों को ये भी बताना होगा कि चंदे की रकम कितनी है।सभी दलों को नकद चंदे की भी जानकारी देनी होगी।ये भी बताना होगा कि चंदे में मिली रकम का कहां और कैसे इस्तेमाल किया गया।सियासी दलों को अपने सारे खर्चों का ब्यौरा देना होगा।
राजनीतिक दल सिस्टम में पारदर्शिता लाने की बात कहते जरूर हैं, पर वे अपने ऊपर किसी तरह की बंदिश नहीं चाहते। चुनाव आयोग की तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी वे अपने चुनाव खर्च और अपनी संपत्ति का सही-सही ब्योरा देने को तैयार नहीं हैं। वे नहीं बताना चाहते कि उन्हें किस तरह के लोगों से मदद मिल रही है।
असल में हमारे देश में हर स्तर पर एक दोहरा रवैया कायम है। राजनीति में यह कुछ ज्यादा ही है। यहां धनिकों से नोट और गरीबों से वोट लिए जाते हैं। लेकिन कोई खुलकर इसे मानने को तैयार नहीं होता। राजनेताओं को लगता है कि अगर वे अपना वास्तविक खर्च बता देंगे तो गरीब और साधारण लोग शायद उनसे रिश्ता तोड़ लें। किसी में यह स्वीकार करने का साहस नहीं है कि उनकी पार्टी धनी-मानी लोगों की मदद से चलती है।
दूसरी तरफ, किसी पार्टी में इतना भी दम नहीं कि वह सिर्फ आम आदमी के सहयोग से अपना काम चलाए। यह दोहरापन कई तरह की समस्याएं पैदा कर रहा है। विकसित देशों में ऐसी कोई दुविधा नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में सारे उम्मीदवार फेडरल इलेक्शन कमिशन के सामने पाई-पाई का हिसाब देते हैं। कोई उम्मीदवार यह बताने में शर्म नहीं महसूस करता कि उसने अमुक कंपनी से या अमुक पूंजीपति से इतने डॉलर लिए।
अगर पार्टियां अपने को आम आदमी का हितैषी कहती हैं, तो आम आदमी को सच बताने में उन्हें गुरेज क्यों है? अगर एक नागरिक किसी पार्टी को वोट दे रहा है, तो उसे यह जानने का अधिकार भी है कि वह पार्टी अपना खर्च कैसे चलाती है। अगर राजनीतिक दल वास्तव में जनहित के लिए काम करते हैं और उनके सारे फैसले जनता को ध्यान में रखकर होते हैं तो वे पारदर्शिता का परिचय देने के लिए क्यों तैयार नहीं हैं? राजनीतिक दलों ने सूचना आयोग के फैसले का विरोध कर यही जाहिर किया है कि वे खुद को निजी जागीर की तरह चलाना चाहते हैं। लोकतंत्र में जागीर अथंवा निजी कंपनियों की तरह चलाए जा रहे राजनीतिक दलों के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। बेहतर हो कि राजनीतिक दल यह समझें कि उनका हित पारदर्शिता का परिचय देने में है, न कि तरह-तरह के बहाने बनाकर उससे बचे रहने में।