देश में आजकल प्रोपगैंडा का दौर चल रहा है। राजनैतिक पार्टियां अपने अपने फायदे के लिए प्रोपगैंडा कर रही है। लेकिन इस मामले में शायद भाजपा कुछ ज्यादा ही बदनाम है और अधिकांशतः कथित उदारतावादियों के निशाने पर रहती है। लेकिन ऐसा लगता है कि देश में उदारतावाद सिर्फ एकतरफा चल रहा है, जो केवल मुस्लिमो के खिलाफ होने वाली किसी छोटी मोटी घटनाओ को भी बड़ा बनाकर हिन्दुओ को बदनाम करने की कोशिश की जाती है वही हिन्दुओ को जब मुस्लिम मारते है तो किसी न्यूज़ चैनेल में कोई ब्रेकिंग न्यूज़ नही होती, कुछ न्यूज़ चैनल जैसे ndtv तो मृतक हिन्दू को ही कटघरे में खड़ा कर देते है|
यूं तो कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर देश के कथित उदारतावादियों को घेरा जा सकता है। लेकिन यहां हम हाल ही में हुई कन्नड़ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के संबंध में बात करेंगे। गौरतलब है कि हाल ही में गौरी लंकेश की हत्या की जांच के लिए गठित एसआईटी ने दो संदिग्धों के स्केच जारी किए थे। लेकिन यहां एक और बात गौर करने लायक थी, जिस पर शायद मीडिया का ध्यान नहीं गया या फिर जान बूझकर इस बात को नजरअंदाज कर दिया गया। वो बात ये थी कि गौरी लंकेश के मर्डर में अभी तक दक्षिणपंथी ताकतों के शामिल होने का कोई सबूत नहीं मिला है।
बता दें कि जिस रात गौरी लंकेश की हत्या हुई थी, उसके तुरंत बाद ही मीडिया और कथित उदारवादियों का जो रिएक्शन था, वो ये था कि गौरी लंकेश की हत्या के पीछे हिंदूवादी संगठन या दक्षिणपंथी ताकतें है। हैरानी की बात है कि बिना किसी सबूत, जांच पड़ताल के गौरी लंकेश की हत्या के बाद दक्षिणपंथी ताकतों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी शुरु हो गए और एक इस तरह का माहौल बन गया, जिसमें गौरी लंकेश के खिलाफ बोलना, एक तरह से गौरी लंकेश के मर्डर को सही ठहराना हो। हालांकि कुछ लोगों ने सचमुच बड़े ही गलत तरीके से गौरी लंकेश की हत्या को सही ठहराने की कोशिश की, जिस पर काफी बवाल भी हुआ था। वह सचमुच गलत है और उसकी आलोचना होनी ही चाहिए।
वहीं इस पूरे मामले पर तुर्रा यह कि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने गौरी लंकेश का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या गौरी लंकेश को सिर्फ इसलिए राजकीय सम्मान दिया गया क्योंकि उनकी हत्या हुई, या फिर उनकी हत्या के पीछे हिंदूवादी संगठनों का नाम आ रहा था। क्या यह कर्नाटक की कांग्रेस सरकार की राजनीति चमकाने की कोशिश नहीं थी ? वही कर्णाटक में रोज आरएसएस के कार्यकर्त्ता मारे जाते है किन्तु उसपर कोई सवाल नहीं खड़ा करता है, आखिर क्यों?
बता दें कि कल ही एक महिला इंजीनियर को लोगों की भीड़ ने सिर्फ इसलिए पीटा, क्योंकि वह गोहत्या का विरोध कर रही थी। एक आर्मी ऑफिसर को गौ तस्करों ने मार डाला, पश्चिम बंगाल में हिन्दू रोज मारे जाते, दीपावली के दिन ही दीपावली मानाने के कारन कश्मीर के हिन्दू परिवारों के मारा पीटा गया धमकी भी दी गई आदि कई घटनाये है लेकिन हैरानी की बात है कि इस तरह के मुद्दों पर कभी कोई उदारवादी अपनी आवाज बुलंद नहीं करता है। यदि कोई ऐसे मुद्दों पर बोलता है तो उसे सांप्रदायिक होने का तमगा दे दिया जाता है और उसके सारे तर्कों को सिर्फ सांप्रदायिकता की तराजू से तौला जाता है। बता दें कि यह हाल सिर्फ कर्नाटक या किसी एक राज्य का नहीं ब्लकि पूरे देश का है। शायद यही कारण है कि देश में उदारवादियों को शक की नजरों से देखा जा रहा है। यदि आप मुस्लिमो के पक्ष में बोलते है, हिन्दुओ पर अभद्र टिप्पणी करते है, हिन्दू देवी देवताओ को अपमानित करते है तो आप सेक्युलर है, परन्तु यदि आप ने एक शब्द भी हिन्दुओ के पक्ष में बोला तो आप भगवा आंतकी है|

कब बदलेंगे हम?

अक्सर हम ये पढ़ते आये हैं कि भारत एक ऐसा देश है, जहां अलग-अलग धर्म, जाति और सम्प्रदाय के लोग मिलकर रहते हैं और ऐसा है भी। पर आज के समय में जिस तरह का माहौल देश में बनाया जा रहा है वो चिंता का विषय है। वोटों की राजनीति में लोग देश को भूलते जा रहे हैं। साथ ही संस्कृति और देश की सुरक्षा के साथ भी खतरनाक खेल खेला जा रहा है।
आज के समय में कांग्रेस जिस तरह का हथकंडा अपना रही है, वो देश को धरातल से रसातल की ओर ले जा रहा है। विपक्ष का मतलब होता है कि आप सत्तारूढ़ पार्टी का विरोध करें, लेकिन देश की एकता और अखंडता को ताक पर रखकर नहीं। गलती सिर्फ राजनीतिक पार्टियों की नहीं है, इसमें जनता भी दोषी है जो आज पढ़ी लिखी होते हुए भी धर्म और जाति के नाम पर लड़ने मरने को तैयार हो जाती है।

इसका हाल ही में एक उदाहरण उत्तर प्रदेश में भीम सेना के रूप में देखने को मिला। सच्चाई तो यह है कि आज देश में आरक्षण की उतनी जरूरत नहीं है, जितनी होनी चाहिए थी पहले। फिर भी लोग आज भी उसी ज़िन्दगी में जीना चाहते हैं। एक दूसरे को विदेशी बताने से देश का विकास नहीं होगा और ना ही उन लोगों का जो जाति के नाम पर तलवार और डंडे उठा लेते हैं।

इतना ही कहना चाहूंगा कि ये राजनीतिक पार्टियां आपको रोटी और कपड़ा सिर्फ अपने फायदे तक ही दे सकती हैं। समय है खुद को बदलने का और जात-पात से ऊपर उठने का। तभी देश को इस सब नेताओं से बचाया जा सकता है।

निरंकुश न्यायपालिका के खतरे : सुधार कब ?

मित्रों, हम सभी जानते हैं कि हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान में न तो कार्यपालिका, न ही संसद और न न्यायपालिका को ही बल्कि संविधान को ही सर्वोच्च कहा है| संविधान के अनुसार कानून बनाना संसद का काम होगा और संविधान की रक्षा करना न्यायपालिका का| यद्यपि तीनों के बीच अधिकारों का बंटवारा करते समय चेक एंड बैलेंस अर्थात नियंत्रण और संतुलन को प्राथमिकता दी गई तथापि उन्होंने इंग्लैंड की तरह संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया, जिसके अनुसार राष्ट्रपति नाम मात्र का शासनाध्यक्ष होगा और उसको अपना शासन मंत्रिमंडल के परामर्श से चलाना होगा और वह परामर्श राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होगा.राष्ट्रपति स्वयं निर्णय नही ले सकता |
मित्रों, यह परामर्श शब्द एक जगह और भी संविधान में आया है| संविधान का अनुच्छेद १२४ उल्लेख है कि राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करता है जिन्हें वह इस कार्य के लिए आवश्यक समझता है| यह अनुच्छेद मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति को मुख्य न्यायाधीश से परामर्श लेना अनिवार्य बनाता है|
इसी प्रकार संविधान में अनुच्छेद २१७ में प्रावधान किया गया है कि किसी उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, सम्बंधित राज्य के राज्यपाल एवं उस राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श लेना अनिवार्य है| परन्तु संविधान में परामर्श शब्द को सही व् स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है कि यह परामर्श बाध्यकारी होगा अथवा नहीं| इसलिए यह पूर्णतः स्पष्ट नहीं है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में किसे प्रधानता होगी राष्ट्रपति को या न्यायाधीशों को|
मित्रों, न्यायपालिका की स्वतंत्रता बहुत संवेदनशील मुद्दा है क्योंकि प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कार्यकाल में उस पर कई गंभीर आघात किए गए थे| उसी समय “प्रतिबद्ध न्यायपालिका” का नारा दिया गया था और वरिष्ठतम जज की उपेक्षा करके उससे जूनियर जज को भारत का प्रधान न्यायाधीश बना दिया गया था| जिसके चलते इमरजेंसी के दौरान न्यायपालिका की भूमिका गौरवपूर्ण नहीं रही| इसीलिए उसके बाद पूरी कोशिश की गई कि न्यायपालिका को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त किया जाए और जजों की नियुक्ति में सरकारी भूमिका को कम किया जाए|
मित्रों, कुछ इस तरह के माहौल में उपरोक्त अनुच्छेदों में परामर्श शब्द को परिभाषित करने हेतु सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तीन निर्णय दिए गए जिन्हें ३ न्यायाधीशवाद की संज्ञा दी गई| प्रथम न्यायाधीशवाद में ७ न्यायाधीशों की पीठ ने 4:3 के बहुमत से १९८१ में निर्णय दिया कि अनु. १२४ एवं २१७ में परामर्श का अर्थ भारत के मुख्य न्यायाधीश की सहमति नहीं है| यदि राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश के मध्य मतभिन्नता आती है तो राष्ट्रपति की राय प्रभावी होगी. लेकिन वर्ष १९९३ में द्वितीय न्यायाधीशवाद में ९ न्यायाधीशों की पीठ ने ७:2 के बहुमत से वर्ष १९९३ में निर्णय को उलट दिया| इस निर्णय में परामर्श को सहमति माना गया और विवाद की स्थिति में मुख्य न्यायाधीश की राय को प्रभावी बताया गया| इसी निर्णय के आधार पर कोलेजियम प्रणाली अस्तित्व में आई|
मित्रों, इस प्रणाली में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश एवं २ अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीशों की राय से सरकार को अवगत करा दी जाने की व्यवस्था बनाई, जो कि राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी थी| अपवादस्वरुप सरकार मजबूत एवं ठोस तर्कों से अनुशंसित नियुक्ति को अस्वीकार कर सकती थी किन्तु निर्णय में व्यवस्था थी कि यदि पुनः अनुशंसा करनेवाले न्यायाधीश एकमत से सरकार के तर्कों को दरकिनार करके अनुशंसित नियुक्ति की पुनः अनुशंसा करते हैं तो सरकार यह नियुक्ति करने के लिए बाध्य होगी| इसके बाद वर्ष १९९८ में तृतीय न्यायाधीशवाद में कोलेजियम के आकार को बढाकर सर्वोच्च न्यायालय के ४ वरिष्ठतम जजों को भी शामिल कर लिया गया|
मित्रों, फिर तो माननीय न्यायमूर्तियों ने न्यायाधीश के पद की ऐसी अन्यायपूर्ण बंदरबांट की कि एनजेएसी पर सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान दिए गए आंकड़ों के अनुसार देश के 13 हाईकोर्ट में 52 फीसदी या करीब 99 जज बड़े वकीलों और जजों के रिश्तेदार हैं। आरोपों के अनुसार जजों की नियुक्ति प्रणाली में 200 अभिजात्य रसूखदार परिवारों का वर्चस्व है। सुप्रीम कोर्ट के जज कुरियन जोसफ ने कोलेजियम व्यवस्था में खामी पर सहमति जताते हुए सुधार के लिए खुलेपन की जरूरत जताई थी। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट अपने स्तर पर कोलेजियम व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए न्यायिक आदेश पारित करने में विफल रहा। उसने केंद्र सरकार को ही मेमोरेंडम ऑफ प्रोसिजर (एमओपी) में बदलाव करने का निर्देश दे दिया।
मित्रों, उसके बाद केंद्र सरकार ने बार-बार न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन के प्रयास किए| अंततः वर्ष २०१४ में वर्तमान केंद्र सरकार ने १२१वां संविधान संशोधन विधेयक २०१४ एवं राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक को दोनों सदनों से १४ अगस्त,२०१४ को पारित करवाया| तत्पश्चात राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को १३ अप्रैल, २०१५ को भारत सरकार के राजपत्र में अधिसूचित कर दिया गया| इस जन्म से पहले मार दिए गए राष्ट्रीय नियुक्ति आयोग में ६ सदस्य होने थे जिनमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय के ही २ वरिष्ठतम न्यायाधीश, केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री और दो प्रतिष्ठित व्यक्ति जो ३ सदस्यीय समिति जिसमें प्रधानमंत्री, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता शामिल होंगे द्वारा चयनित होंगे शामिल होने थे| परन्तु १६ अक्टूबर २०१५ को सर्वोच्च न्यायलय ने न्यायमूर्ति जे.एस. खेहर की अध्यक्षता में ५ न्यायाधीशों की पीठ ने ४:1 बहुमत से संविधान संशोधन को असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया और पुराने कोलेजियम प्रणाली को ही जारी रखने का निर्णय देते हुए इसकी खामियों में सुधार हेतु सुझाव मांगे| संविधान संशोधन और आयोग के गठन वाला कानून संसद के दोनों सदनों ने बिना किसी विरोध के पारित किया था और उसे 20 विधानसभाओं का भी अनुमोदन प्राप्त था| इसलिए यह कहा जा सकता है कि ये जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करते थे| इतना ही नहीं न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना विधि आयोग और प्रशासनिक सुधार आयोग जैसी संस्थाओं के व्यापक अध्ययन और सिफारिश के बाद की गई थी।
मित्रों, अब जबकि सुप्रीम कोर्ट एमओपी में बड़े बदलाव के लिए राजी नहीं है और उसके बगैर नए जजों की नियुक्ति लटकी है| चीफ जस्टिस के अनुसार विभिन्न हाईकोर्ट में 43 फीसदी पद रिक्त होने से 38 लाख मुकदमे लंबित हैं, लेकिन तथ्य यह भी है कि उच्च न्यायालयों के अलावा अन्य अदालतों में 3.5 करोड़ मुकदमे लंबित हैं। सवाल है कि ये मुकदमे क्यों लंबित हैं? इन अदालतों में तो जजों की नियुक्ति पर कोई गतिरोध नहीं है। न्यायिक सुधारों और जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव के बगैर केवल जजों की संख्या बढ़ाने से आम जनता को जल्दी न्याय कैसे मिलेगा? देश में 1940 और 1950 के दशक के मुकदमे अभी भी लंबित हैं। दूसरी ओर बड़े वकीलों की उपस्थिति से जयललिता और सलमान खान जैसे रसूखदारों के मुकदमों में तुरंत फैसला हो जाता है, हिन्दुओ को अपमानित करने के लिए हिन्दुओ के विरोध वाले, उन्हें अपमानित करने वाले फैसले तुरंत आ जाते है। पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण ने जजों के भ्रष्टाचार को दर्शाते हुए एक हलफनामा दायर किया था। राजनीतिक भ्रष्टाचार पर सख्ती दिखाने वाला सुप्रीम कोर्ट जजों की अनियमितताओं के मामलों में सख्त कारवाई करने में विफल रहा। दिलचस्प है कि जजों को बर्खास्त करने के लिए संविधान में महाभियोग की प्रक्रिया निर्धारित की गई है, लेकिन यह प्रक्रिया इतनी कठिन है कि उसके इस्तेमाल से आज तक कोई भी जज हटाया नहीं जा सका है।
मित्रों, आखिर हमारी अदालतें 19वीं शताब्दी के कानून और 20वीं सदी की मानसिकता से लैस होकर 21वीं सदी की समस्याओं को सिर्फ जजों की संख्या बढ़ा कर कैसे सुलझा सकती हैं? जब सीनियर एडवोकेट्स की नियुक्ति हेतु सभी जजों की सहमति चाहिए होती है तो फिर जजों की नियुक्ति हेतु पांच जजों की बजाय सभी जजों की सहमति क्यों नहीं ली जाती? जब लोकतंत्र के सभी हिस्से सूचना अधिकार कानून के दायरे में हैं तो फिर जज उसके दायरे में आने से परहेज क्यों करते है? जब संसद की कार्यवाही का सीधा टीवी प्रसारण हो सकता है तो फिर अदालतों की कार्यवाही का सीधा प्रसारण या रिकार्डिंग को क्यों रोका जा रहा है? अगर जजों के बच्चे या रिश्तेदार हाईकोर्ट में वकालत कर रहे हैं तो फिर ऐसे जज अपना तबादला खुद कराकर नैतिक मिसाल क्यों नहीं पेश कर पा रहे हैं? सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार तीन महीने से ज्यादा कोई आर्डर रिजर्व नहीं रखा जा सकता। इसके बावजूद तमाम मामलों में सालों साल बाद आदेश पारित हो रहे हैं।
मित्रों, सुप्रीम कोर्ट द्वारा एडीआर मामले मे दिए गए फैसले के बाद सांसद और विधायक का चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को व्यक्तिगत विवरण का हलफनामा जरूरी हो गया है। यदि जज भी सत्ता केंद्रों के साथ अपने संबंधों का हलफनामा दें तो उनकी नियुक्ति पारदर्शी हो जाएगी। इस तरह का हलफनामा देने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट की खामोशी चिंताजनक है। नेम और शेम के तहत हलफनामे में विवरण के अनुसार रिश्तेदारों को चयन प्रक्रिया से बाहर होना ही पड़ेगा। इससे समाज के वंचित वर्ग के योग्य लोगों को जज बनने का मौका मिलेगा। हलफनामे में गलत तथ्य होने पर जजों को बगैर महाभियोग के हटाने में आसानी होगी।
मित्रों, सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अपनी जगह है, लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि कॉलेजियम प्रणाली बहुत सुचारु ढंग से काम नहीं कर रही है| इसमें सुधार-संबंधी सुझावों पर विचार करने की बात कहकर खुद सुप्रीम कोर्ट ने प्रकारांतर से यह स्वीकार किया है कि प्रणाली में खामियां हैं| पिछले कई वर्षों के दौरान हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई जजों के भ्रष्टाचार के बारे में सवाल उठे हैं| देश के शीर्षस्थ कानूनविदों में से एक फाली एस. नरीमन ने हालांकि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का विरोध किया था, लेकिन उनका भी यह कहना था कि कॉलेजियम प्रणाली बिलकुल भी पारदर्शी नहीं है और इसे बदलने की जरूरत है| उन्होंने कहा कि वह आयोग का इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि छह सदस्यों वाले इस आयोग में तीन ऐसे सदस्यों की नियुक्ति का प्रावधान है जिनमें कानून मंत्री भी शामिल होंगे और शेष दो सदस्य ऐसे होंगे जिनका कानून से कोई वास्ता ही नहीं होगा| इस तरह जजों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश पैदा हो जाएगी|
मित्रों, दरअसल सबसे बड़ी समस्या यह है कि एक बार जज बन जाने के बाद उस व्यक्ति पर चाहे कितना भी गंभीर आरोप क्यों न लग जाए, उसे उसके पद से हटाने की प्रक्रिया इतनी कठिन और लंबी है कि हटाना लगभग असंभव ही है| इसके कारण यह सवाल पैदा होता है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बरकरार रखते हुए उसे जवाबदेह व् पारदर्शी कैसे बनाया जाए? इस समय किसी को भी यह नहीं पता है कि जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया क्या है और उन्हें किन कसौटियों पर कसने के बाद नियुक्त किया जाता है, यानी उनकी नियुक्ति के लिए क्या मानक तय किए गए हैं| इसलिए यह राय बल पकड़ती जा रही है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बचाने के नाम पर न्यायपालिका ने खुद को निरंकुश बना लिया है| यह अपने अधिकारों का दुरुपयोग तो है ही साथ ही लोकतंत्र में उसका कोई भी स्तंभ निरंकुश नहीं हो सकता, जो कि लोकतंत्र के लिए काफी खतरनाक परिणाम ला सकते है|
मित्रों,कहाँ तो हमने सोंचा था कि वर्तमान केंद्र सरकार पूरी-की-पूरी न्याय व्यवस्था में ही आमूल-चूल परिवर्तन करेगी जिससे डिजिटलाईजेशन के इस युग में न्याय पाना चुटकी बजाने जितना आसान होगा और कहाँ अभी तक उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति को लेकर जारी गतिरोध ही दूर नहीं हो सका है| सवाल उठता है कि न्यायपालिका में बांकी के सुधार भी क्या स्वयं न्यायपालिका ही करेगी या संसद को बेधड़क होकर करने देगी जो संसद का संवैधानिक अधिकार भी है? फिर भी मैं मानता हूँ कि सरकार और संसद को इस दिशा में अपना काम तेजी से जारी रखना चाहिए जिससे हमारी न्याय व्यवस्था २१वीं सदी के साथ त्वरित गति से कदम-से-कदम मिलाकर चल सके| अगर आगे भी सर्वोच्च न्यायालय इस पवित्र कार्य में बाधा डालता है तब भी जनता के समक्ष यह तो साबित हो ही जाएगा वर्तमान सरकार की मंशा में कोई खोट नहीं है|

मोदी सरकार ने कौओं के मोती चुगने पर पाबंदी लगा दी है


गोपीराम: भैया, आज तो हम तुम्हे एक नए जमाने की कथा सुनायेगे

जनता: अरे बाबा किसी भी जमानेकी सुनाओ पर सुनाओ ज़रूर
सियावर रामचंद्रकी जय !!
गोपीराम: हे जी रे
हे रामचंद्र कह गए सिया से
रामचंद्र कह गए सिया से
ऐसा कलयुग आएगा
हंस चुगेगा दाना तुनका
कौआ मोती खाएगा
हे जी रे …
ये मशहूर गीत हिन्दी फ़िल्म ‘गोपी’ का है, जो वर्ष 1970 में प्रदर्शित हुई थी. इस फिल्म में नायक की भूमिका भारतीय सिनेमा के महान् अभिनेता दिलीप कुमार ने बहुत शानदार और यादगार ढंग से निभाई थी. फिल्म का नायक गोपीराम भोलेभाले गाँव वालों के सामने यह गीत जाता है. फिल्म की कहानी समाज में व्याप्त अन्याय, भ्रष्टाचार, बेईमानी, दबंगई, चरित्रहीनता और शोषण आदि के खिलाफ आवाज उठाने व उससे लड़ने के इर्दगिर्द ही घूमती है. ये सब बुराइयां समाज में आज भी व्याप्त हैं. हिन्दू धर्मशास्त्रों में ऐसा वर्णित है कि आज से काफी समय पहले त्रेतायुग में परमात्मा के विशेष अंशावतार भगवान् रामचंद्र जी ने अपनी धर्मपत्नी सीताजी को कलयुग में घटने वाली बहुत सी घटनाओं, लोगों के रहनसहन और तामसी प्रवृत्तियों के बढ़ने की जानकारी दी थी. ‘गोपी’ फिल्म के उपरोक्त गीत में उन्ही सब बातों का वर्णन है.
“रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलियुग आएगा।
हंस चुगेगा दाना तिनका कौआ मोती खाएगा।।”
इन पंक्तियों में छिपे हुए अर्थ पर बिचार करें तो इसका बहुत सीधा सा अर्थ यह है कि भगवान् रामचंद्जी अपनी धर्मपत्नी सीताजी से कह रहे हैं कि कलयुग (आज के समय) में हंस (भोलेभाले लोग) को ईमानदारी और निष्ठा से बहुत परिश्रम करने पर भी दाना-तिनका (मामूली भोजन और साधारण जीवनयापन) ही खाने को मिलेगा और दूसरी तरफ कौआ (धूर्त, बेईमान, भ्रष्ट और बहुत चालाक किस्म के लोग) बिना परिश्रम किये ही बेशक़ीमती मोती (महंगा भोजन और अय्याशी भरा जीवनयापन) खाएंगे. बात बहुत हद तक सही है. बहुत पूजापाठ करने वाले, सीधेसादे और ईमानदार लोग आज के युग में ज्यादा परेशान हैं. समाज में आज हर जगह पर धूर्त, बेईमान, भ्रष्ट, दबंग, चरित्रहीन और शातिर दिमाग वाले बेहद तेजतर्रार किस्म के लोग हावी हैं. इनका समाज में बोलबाला है, एकछत्र वर्चस्व कायम है.
यदि हम देश की बात करें तो साल 2014 तक कांग्रेस के शासनकाल में देश के तमाम संसाधनों पर ऐसे ही लोग हावी थे. मनमोहन सिंह के दस साल के शासनकाल में हुए सैकड़ो घोटाले इस बात के पक्के सबूत हैं. साल 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो देश के आम लोंगो के मन में न्याय मिलने के साथ साथ बहुत कुछ सुविधाएं मिलने की भी उम्मीद जगी. पिछले तीन साल में मोदी सरकार ने इस दिशा में जो अथक परिश्रम किया है, उसके अच्छे नतीजे भी मिलने शुरू हो गए हैं. मोदी सरकार ने आम लोंगो को यदि पूर्णतः खुश नहीं तो निराश भी नहीं किया है, लेकिन मोदी सरकार की वास्तव में जनसेवा करने वाली निष्ठा, अथक परिश्रम और ईमानदारी वाली कार्यशैली देखकर बेईमानी और मुफ्त का माल खाने वाले लोग आज जरूर निराश और परेशान होकर यहां वहां मोदी विरोध की आग में घी डालने का कार्य कर रहे हैं. इस मुहीम में कई दलों के नेता और उनसे कभी पूर्व में उपकृत होने वाले, पत्रकारों, तथाकथित सेक्युलरों और बुद्धिजीवियों की जमात भी शामिल हैं.
शास्त्रों के अनुसार द्वापर युग में नारद जी ने एक बार भगवान कृष्ण से पूछा था, “प्रभु! कलयुग कैसा होगा?”
भगवान् कृष्ण ने उत्तर दिया था, “देवर्षि नारद! सतयुग, सत्य का युग था. त्रेता मर्यादा का युग था. द्वापर कर्म का युग है और कलियुग न्याय का युग होगा.”
भगवान् कृष्ण की वाणी सत्यसिद्ध हो और कलयुग में अब तो लोंगो को न्याय मिले. समाज में आज भी व्याप्त छूत-अछूत, ऊंच-नीच, अमीरी-गरीबी के भेदभाव ख़त्म हों और दबंगई व सामंती प्रवृत्ति वाले अत्याचारों से आम जनता को मुक्ति मिले, इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को विशेष प्रयास करने होंगे. आजकल राहुल गांधी मोदी पर तंज कस रहे हैं कि विकास पागल हो गया है. विकास पागल हो गया है या फिर देश का विकास देखकर कांग्रेस के लोग पागल हो रहे हैं, इस पर अब गंभीरता से विचार होना चाहिए. पूर्व केंद्रीय वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा और पूर्व केन्दीय मंत्री अरुण शौरी आदि भाजपा के नेता राहुल गांधी और चिदंबरम की हाँ में हाँ मिलाते हुए मोदी सरकार की कटु आलोचना कर रहे हैं. मजेदार बात यह है कि इनका साथ वो कांग्रेसी नेता दे रहे हैं, जो इनके मंत्रित्व काल को इतिहास का काला अध्याय मानते हैं. इसका सीधा सा अर्थ है कि अपने शासनकाल के ये पूरी तरह से नकारा और अयोग्य मंत्री थे. दरअसल इनकी असली परेशानी यह है कि मोदी सरकार ने कौओं के मोती चुगने पर पाबंदी लगा दी है, वस्तुतः जिसपर एकमात्र हक़ हंसों यानी जरुरत मंद आम जनता का है.

प्रधान मंत्री मोदी ने गुजरातियो को दी सौगात

पीएम मोदी ने रविवार को गुजरात के भावनगर में रोल-ऑन रोल ऑफ (रो-रो) फेरी सेवा का शुभारंभ किया। इसके साथ ही घोघा और दाहेज के लोगों के लिए बड़ी राहत की शुरुआत हो गई। दरअसल यह दोनो शहर समुद्र के दो अलग किनारों पर बसे हैं।
फिलहाल इन शहरों को सड़क जोड़ती है जिसकी दूरी 310 किमी है इसे पूरा करने में 10 घंटे का समय लगता है। लेकिन रो-रो फेरी के शुरू होने के बाद यह दूरी महज 32 किमी रह जाएगी। इसके पहले चरण में केवल यात्रियों को इस पार से उस पार जाने का मौका मिलेगा लेकिन दूसरे चरण में इस फेरी सर्विस के माध्यम से बड़े वाहन भी ले जाए जा सकेंगे।
615 करोड़ की लागत से बने इस प्रोजेक्ट की आधारशिला पीएम मोदी ने राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में 2012 में रखी थी। इस प्रोजेक्ट का दूसरा चरण अगले दो महीने में पूरा हो जाएगा। यात्रियों को इस फेरी सर्विस का लाभ महज 600 रुपए में मिल सकेगा जो सड़क मार्ग के मुकाबले काफी कम है।
इसके बाद पीएम मोदी इस फेरी में सवार होकर घोघा से दाहेज पहुंचे। दाहेज में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने नया मंत्र देते हुए कहा कि हमारे लिए पी फॉर पी है यानी पोर्ट फॉर प्रॉस्पेरिटी
अक्टूबर में तीसरी बार गुजरात की यात्रा करने वाले पीएम मोदी रविवार को फेरी सेवा के पहले चरण को शुरू करेंगे। यह सिर्फ यात्रियों के लिए है। वह खुद घोघा से दाहेज जाएंगे, जहां एक सभा को संबोधित करेंगे। पीएम श्री भावनगर डिस्ट्रिक्ट को-ऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन लिमिटेड के सर्वोत्तम कैटल फीड प्लांट का भी उद्घाटन करेंगे। इसके अलावा अन्य परियोजनाओं का भी उद्घाटन करेंगे।
देश के बंदरगाह विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और हम ब्लू ईकोनॉमी पर ध्यान दे रहे हैं। हमारा मानना है कि अकेले सागर माला प्रोजेक्ट से ही 1 करोड़ नौकरियां पैदा होंगी।
ट्विटर पर इससे संबंधित कुछ ट्वीट:-






जानिए पूरे विश्व का सबसे बड़ा मंदिर कौन सा है!

आप जानते ही हैं, वैसे तो इस पूरी दुनिया में मंदिरों की कोई भी कमी नहीं है, क्योंकि हमारे यहां के जो लोग हैं, उनमें मंदिरों को लेकर काफी अच्छी धार्मिक मान्यता है, इसीलिए इस पूरी दुनिया में लोग हमेशा ही अपने परिवारों के साथ किसी भी मंदिरों में जाते जरूर हैं और विज्ञानिकों ने भी यहां तक सिद्ध कर दिया है कि अगर इस पृथ्वी पर कोई भी चीज सत्य है तो वह केवल हमें मंदिरों में जाकर जो शांति प्रतीत होती है वही सत्य है, पर आज हम आपके सामने जिस मंदिर की बात कर रहे हैं वह मंदिर इस पूरे विश्व का सबसे बड़ा मंदिर है और यह मंदिर की खास बात यह है कि यह सबसे बड़ा होने के साथ-साथ सबसे ज्यादा प्रसिद्ध भी हैं।यहां पता ही नहीं की कितने लोगों का रोज आना जाना लगा रहता है और यहां पर जो भी लोग पूरी मान्यता के साथ आते हैं उनके सब कार्य सिद्ध भी होते हैं।
आपको बता दें, यह विश्व के सबसे बड़े मंदिर का नाम ‘अकोरबाट’ मंदिर है।’अकोरबाट’ मंदिर का वैसे पूरा नाम यशोधर पर था और इसके साथ आपको बता दें, इस मंदिर का निर्माण राजा सूर्यवर्मन द्वितीय के शासनकाल में हुआ था।यह मंदिर वैसे ‘मीकांग’ नदी के किनारे के आसपास के शहर में बना हुआ है।
यह मंदिर पूरे संसार का सबसे बड़ा मंदिर कहलाया जाता है।इस मंदिर का फैलाव सैंकड़ों वर्गों मील से भी कहीं ज्यादा है और इस मंदिर की खास बात तो यह रही है, कि यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और आपको पता ही है जहां कोई भी मंदिर होता है वहां बड़े-बड़े शिव भगवान के मंदिरों का निर्माण भी करवाया जाता है, इसी मंदिर में भी शासकों ने यहां बड़े-बड़े शिव के मंदिरों का निर्माण करवाया था।’अंकोरवाट’ का यह मंदिर कंबोडिया राष्ट्र का सबसे बड़ा प्रतीक है।यह मंदिर मेरु पर्वत का प्रतीक भी कहलाया जाता है।
इस मंदिर की दीवारों पर ऐसी-ऐसी चित्रकारिया की हुई है, कि जो भी इसे एक नजर देखता है वह देखता ही रह जाता है यहां पर पता नहीं लोग कितने लोग इस मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं।इस मंदिर की मान्यता ही यही है, कि जो भी यहां पूरी श्रद्धा से आता है वह यहां से कोई ना कोई फल जरूर लेकर जाता है।
जो भी इस मंदिर की दीवारों पर शिल्प कलाएं हुई हैं, वह बहुत ही सुंदर के साथ साथ जगह जगह पर प्रसंग भी प्रकट करती हैं।इन प्रसंगों में जैसे अप्सराओं का चित्रण है, वह असुर और देवताओं के बीच समुद्रमंथन का भी पूरा दृश्य दिखाया गया है, जो देखने में बहुत ही सुंदर प्रतीत होता है।विश्व का सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थल के साथ-साथ यह मंदिर विश्व धरोहर स्थलों में से एक माना जाता है। इस मंदिर की खास बात यह भी मानी जाती है की मंदिर में सूर्यउदय व सूर्यास्त बहुत मनोरम होता है।
इस मंदिर को लाखों-करोड़ों पर्यटक देखने देशों विदेशियों से आते हैं।इस मंदिर में जब पर्यटक लाखों करोड़ों की संख्या में होते हैं, तो इस मंदिर में दृश्य का नजारा कुछ अलग ही होता है।यह मंदिर सबसे प्रसिद्ध स्थल माना गया है।यह मंदिर इस बात को सिद्ध करने करता है,कि भारतीयों ने जब स्वर्ण द्वीप में अनेक राज्यों की स्थापना करी थी तब उत्तरी भाग में स्थित कंबोज राज्य के बारे में राज्य का स्वास्थ्य कोटिल्य जो था, वह एक ब्राह्मण कुल का था।’अकोरबाट’ मंदिर की एक प्रतिकृति भारत में भी बनने जा रही है।
भारत में यह प्रतिकृति बनने की बात कोई हैरानी तो प्रकट नहीं करती है, क्योंकि भारत में भी इस तरह के काफी मंदिर मौजूद है, जहां पर लाखों और करोड़ों श्रद्धालु दर्शनों के लिए जरूर आते हैं।सूत्रों के अनुसार इस मंदिर का नाम अंकोरवाट राम मंदिर होगा जिसका निर्माण भारत में होने जा रहा है।इस मंदिर को भगवान राम को समर्पित किया जाएगा।
सियाम रीप क्षेत्र अपने आगोश में सवा तीन सौ से ज्यादा मंदिर समेटे हुए है। शिव और विष्णु के अलावा ब्रह्मा का ता प्रोम का ब्रह्मा मंदिर तो है ही, बायन का मंदिर एक मात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें धर्म बदलने पर मूर्तियों में बहुत तोड़-फोड़ हुई। इसको बनवाने वाला राजा जयवर्मन षष्टम शुद्ध बौद्ध था, इसलिए उसने बुद्ध की मूर्तियाँ बायन मंदिर में लगवाईं।

भारतीय विशेषज्ञ सलाहकारः किसी भी भारतीय को यह जानकर गर्व हो सकता है कि आज भी एक भारतीय अंगकोर पार्क के लिए बनी कंबोडिया सरकार की ऍथोरिटी का सलाहकार है। सलाहकार हैं प्रो. सच्चिदानंद सहाय और ऍथोरिटी का नाम है अप्सरा (अथोरिटी फॉर प्रिसर्वेशन ऑफ अंगकोर रीजन)। प्रो. सहाय मगध विश्वविद्यालय के प्रो-वाइस चांसलर रहे हैं।


गुजरातः अल्पेश ठाकोर थामेंगे कांग्रेस का हाथ

गुजरात में चुनावी बिगुल कभी भी बज सकता है। ऐसे में भाजपा के खिलाफ सारे विरोधी एक जुट होते दिख रहे हैं। राज्य में बड़े ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर ने कांग्रेस का हाथ थामने की तैयारी कर ली है। ओबीसी, एससी, एसटी एकता मंच के संयोजक अल्पेश ठाकोर ने राहुल गांधी से मुलाकात की। सूत्रों के मुताबिक अल्पेश ठाकोर 23 अक्टूबर को कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। अल्पेश ने गुजरात में 23 अक्टूबर को होने वाली जनादेश सम्मेलन में राहुल गांधी को शामिल होने का आमंत्रण दिया है। उन्होंने बताया कि राहुल रैली में शामिल होने की हामी भरी है।
अल्पेश ने कहा कि जिग्नेश मेवानी और हार्दिक पटेल दोनों उनके छोटे भाई हैं और वे तीनों मिलकर भाजपा के खिलाफ लड़ेगे। इसके साथ ही कहा कि पीएम मोदी के सामने वह काफी छोटे लोग हैं लेकिन छोटी फुलझड़ी भी बड़ा काम कर जाती है। 7 साल से वह भाजपा के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। अल्पेश ने कहा चुनाव लड़ने के बारे में कांग्रेस पार्टी फैसला लेगी।
गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी ने सार्वजनिक तौर पर बीजेपी विरोधी नेताओं को ये न्योता भेजा है। सोलंकी ने जनता दल यूनाइटेड के नेता छोटू भाई वसावा को भी साथ आने का निमंत्रण भेजा है। वसावा वही नेता हैं, जिन्होंने पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार अहमद पटेल को वोट देने का दावा किया था। वो पटेल के काफी करीबी माने जाते हैं।
इसी बीच हार्दिक पटेल ने कहा है' हमें बीजेपी के खिलाफ संगठित होने की जरूरत है। ये केवल बीजेपी और कांग्रेस का चुनाव नहीं है बल्कि 6 करोड़ गुजरातियों के लिए भी चुनाव है। संविधान के मुताबिक मैं चुनाव नहीं लड़ सकता और न ही कोई जरूरत है। लेकिन बीजेपी के खिलाफ एकजुट होना जरूरी है।'

देश में आजकल प्रोपगैंडा का दौर चल रहा है। राजनैतिक पार्टियां अपने अपने फायदे के लिए प्रोपगैंडा कर रही है। लेकिन इस मामले में शायद भाजपा कुछ ...