अगर मोदी नहीं, तो विकल्प में कौन है हमारे पास?


ऐसे लोग बहुत ज्यादा हैं, जो मोदी को और उनकी नीतियों को इस देश, समाज के लिए जरूरी मानते हैं। इन सबको मोदी मुबारक। मगर ऐसे लोग भी कम नहीं, जो इसी देश और समाज के लिए मोदी तथा उनकी नीतियों को बेहद खतरनाक मानते हैं। ये लोग बाकी देशवासियों को यह समझाने की कोशिश करते रहे हैं कि क्यों मोदी की नीतियां हानिकारक हैं, पर नाकाम होते रहे हैं। जहां कहीं, जिस किसी भी चुनाव में मोदी मुद्दा बनते हैं ऐसे तमाम लोग इस कोशिश में लगते हैं कि मोदी की जीत न हो। एकाध मौकों पर इनकी कोशिशें सफल भी हुई हैं, लेकिन ज्यादातर मौकों पर इन्हें मुंह की खानी पड़ी है। मोदी पहले से ज्यादा बड़े विजेता बन कर उभरे हैं। अपने देशहित नीतियों व कार्यो के दम पर
दिलचस्प बात यह है कि जहां ऐसे लोग मोदी को हराने में या कहा जाए मोदी विरोधी ताकतों को जिताने में कामयाब रहे, वहां भी नतीजे कुछ खास बेहतर नहीं हुए हैं। दिल्ली में आम आदमी
पार्टी ने कुछ लोकप्रिय और जनकल्याणकारी कदम उठाने का दावा करते जरुर हैं, मगर घोटालो आपराधिक कार्यो के कारणों से वे सदा आलोचना के पात्र ही होते है व दिल्ली की जनता के लिए बोझ हो चुके है, यह कहना मुश्किल है कि वे टिकाऊ साबित होंगे या नहीं। चूंकि ये कदम वैकल्पिक अर्थनीति के बुनियादी तर्क पर आधारित नहीं हैं, इसलिए उनका स्वरूप सब्सिडी जैसा ही है। सो, वे कब तक रहेंगे और जब तक रहेंगे तब तक प्रदेश की आर्थिक सेहत पर कितना और कैसा असर डाल चुके होंगे, कहना मुश्किल है। दूसरी और ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि केजरीवाल कहने को भले मोदी के विरोधी हों, लेकिन वह भी किसी तरह की वैकल्पिक राजनीति की बुनियाद नहीं रख पा रहे, दुसरे उनके खुद के घोटाले व उनके विधायको के कारनामे उन्हें ख़त्म करने की पुरजोर कोशिश में लगे रहते है, कुछ हद तक वे कामयाब भी हो रहे है|
उनकी पार्टी के अंदर भी लोकतंत्र नहीं है। वह भी अपनी सारी ताकत चुनावों में झोंक देते हैं। पंजाब और गुजरात के विधानसभा चुनावों में स्थानीय नेतृत्व को पनपने और बढ़ने का मौका देने के बजाय खुद केजरीवाल अपने सारे कैबिनेट सहयोगियों के साथ भिड़े हुए थे। ठीक मोदी की ही तरह। अगर जीतते तो केजरीवाल को पूरा श्रेय मिलता, पर प्रदेश में कोई ऐसा नेता नहीं पनपता जिसे जनता अपना नेता मान पाती। वह केजरीवाल को ही नेता मानने को अभिशप्त होती। यानी वहां जिसे भी मुख्यमंत्री बनाया जाता, वह केजरीवाल की कठपुतली होने को मजबूर होता। जो केजरीवाल का विरोध करते है वो निकल दिए जाते है जो पुनः इन्ही की जड़ें खोदने में जुट जाते है जैसे कपिल मिश्रा, बिन्नी जैसे उनके सहयोगी |
तो कहां है वैकल्पिक राजनीति?
बिहार में लालू और नीतीश के गठबंधन ने मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी को चुनाव में हरा दिया, पर बिहार में क्या अलग तरह की राजनीति मजबूत हुई? लालू के अनपढ़ पुत्रो व लालू यादव के घोटालो व अनावश्यक दखलंदाजी से परेशां व अज़ीज़ आकर अंत में हारकर नितीश को गठबंधन तोड़ना ही पड़ा|
कांग्रेस की बात करना तो बेमानी है, जिसकी बागडोर राहुल, जैसे व्यक्ति के हाथ में है जो आलू की फैक्ट्री लगवा सकते है, नारियल का जुस निकल सकते है, न जाने क्यों मुझे लगता है के कांग्रेस मोदी विरोध में देश विरोधी नीतियों पर चल पड़ा है, मणिशंकर अय्यर का पाकिस्तान से मदद मांगना मोदी को हराने के लिए, राहुल का मौजूदा हालातो में चीनी दूतावास में छुप –छुपाकर मुलाकात करना, जे एन यु यूनिवर्सिटी में देशविरोधी छात्रो के साथ खड़ा होना आदि न जाने ही उदारण है, वस्तुतः मोदी का सामने आज जो भी चुनौतिया है वो कांग्रेस की ही देन है आप स्वयं जानते है, आखिर कांग्रेस के शाशनकल में आपने घोटालो के सिवाय क्या कुछ और सुना है?
यूपी में अगर कांग्रेस और अखिलेश की जोड़ी जीत भी जाती, तो गायत्री प्रजापति जैसे गैंगरेप आरोपी मंत्री को बचने का एक और मौका मिलने के अलावा क्या हो जाता? उनके जातिवाद व सम्प्रदायवाद की तुष्टीकरण की राजनीती कर कुछ और घोटाला करने का मौका और मिल जाता है न? यादव परिवार में देर-सबेर मेल-मिलाप होना ही था। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने अपनी नीतियों में बुनियादी अंतर दिखाने वाला कौन सा वादा किया था? यदि कोई विकासपरक कार्य किया हो तो आप ही बताओ ?
साफ है कि मोदी के विरोधियों को जरा ढंग से सोचने की जरूरत है। मोदी की नीतियों की जो भी गड़बड़ियां हैं, उनके फैसलों के जो भी खतरें हैं उनसे लोगों को अवगत कराने की मुहिम तो खैर जारी रखनी ही होगी, रखनी ही चाहिए। पर विरोध का यह तरीका नाकाफी है कि खुद को मोदी विरोधी बताने वाले सभी लोगों को साथ लाकर मोदी का विकल्प घोषित कर दिया जाए। मोदी के विरोध में कही देश विरोधी न बन जाये, क्योकि इस वक्त विपक्ष के कार्यो से यही लग रहा है, आप बताइए, आप क्या विचार है? विकल्प घोषित होना जरूरी नहीं, विकल्प का बेहतर होना जरूरी है। खुद को मोदी का विकल्प मानने वालों या बताने वालों की यह जिम्म्दारी है कि वे खुद को मोदी से बेहतर साबित करें, यानी मोदी की राजनीति से बेहतर राजनीति पेश करें, मोदी के विजन से बेहतर विजन पेश करें। खास समुदायों को नीचा मानने वाली और उनसे नफरत की सीख देने वाली सोच के बरक्स सबको समान और अपना मानने वाली दृष्टि का औचित्य अपने आचरण से साबित करना होगा। मोदी के देशहित नीतियों के समान ही देशहित के ही लिए मोदी का विरोध होना चाहिए न कि किसी एक परिवार हित, दलहित व वोटहित के लिए मोदी का विरोध ना आप को अच्छी लगेगी ना ही देश की आप जैसे जागरूक मतदाता को, आप बताइए ये आप को अच्छा लगेगा?

यह थका देने वाला श्रमसाध्य और समयसाध्य काम है। इसके लिए आपकी सोच व दिल में देशप्रेम होना चाहिए | मगर इसकी शुरुआत कहीं न कहीं तो दिखनी चाहिए। ऐसे लोग भले कम हों, उनका प्रभाव कम हो, उनके साथ लोग कम हों पर असली विकल्प वही लोग हो सकते हैं। अगर ऐसे लोग कहीं दिख रहे हों, तो उनका साथ देकर और नहीं दिख रहे हों तो खुद वैसा बनकर ही मोदी का विकल्प खड़ा कर सकते हैं, भले इसमें वक्त लगे। पर ऐसे अवसरवादी गठबंधन तात्कालिक तौर पर हमें संतुष्ट या निराश भले करें, विकल्प नहीं मुहैया करा सकते। इसलिए काफी सोच विचार करने के बाद मेरे खुद के विचार से मोदी जैसा मुझे कोई नेता नहीं दिख रहा जो मोदी के सामान सबका साथ –सबका विकास को चरितार्थ कर सके, जो देश के प्रत्येक व्यक्ति से सीधा संबध स्थापित कर सके, जो गरीबो के हित की नीतियों को सुचारुरूप से चला सके, जो देशहित में दलहित को ताकपर रख कर निर्णय लेना, चाहे वो नोटेबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक आदि व अभी-अभी चीन को दोक्लम में झुकाना हो, आप ही बताइए है मोदी का विकल्प? आप को यदि कोई विकल्प मिलता है तो मुझे भी बताइए कौन है?मै इंतज़ार मे हू आपके जवाब के बताइए?