कविता- 'नया ड्रॉफ्ट'


कविता-
'नया ड्रॉफ्ट'

- यादव चंद्र
वर्ग-वर्ग चिल्लाए अस्सी वर्षों तक, बापू का अब स्वप्न-लोक साकार करो
जनता का जनतंत्र कैद है संसद में संसद में घुसकर उसका उद्धार करो
डब्लू.टी.ओ. का प्रसाद चरणामृत ले सम्प्रदायवादी जनता को लूट रहे
तुम भी फुटकर-थोक पार्टियों से मिलकर दाबो डटकर बटन-लूट की छूट रहे
सटे भाजपा से जो उनको तुम तोड़ो शास्त्र वचन है-'जहर,जहर से ही काटो'
अपनी गाड़ी का जो चक्का पंचर हो जहां सुलेसन मिले, उसे पहले साटो
द्वंद्ववाद से जिनके दिल में नफरत हो नया ड्रॉफ्ट दे दिल की खाई को पाटो
कामरेड जो इस उसूल से बिदक रहे उनको पार्टी से ड्रॉप करो, जल्दी छाँटो
संसद में आने की सारी तरकीबें एक-एक कर प्लेनम में परखो, जाँचो
पिछली भूल न फिर से दुहराना 'बाबू'मार्क्स पुराने पड़े,सड़े,अब मत चाटो
सभी वर्ग मिल प्रश्न जहाँ हल करते हैं कामरेड! उसको हम संसद कहते हैं
कितने हैं हम मूर्ख कि व्यापक को तजकर सिर्फ सर्वहारा!बंजारा!- बकते हैं
संविधान जनता का गिरा कुएँ में है जो न निकाले इसे,उसे गद्दार कहो
देश न माफ करेगा उन गद्दारों को इसीलिए यह नया ड्रॉफ्ट है कमरेडो!"