हलाला पर भी रोक लगाई जाए



फैज अहमद फैज ने अरसा पहले औरतों को झकझोरने की कोशिश की थी और कहा था- ‘बोल कि लब आजाद हैं तेरे, बोल ज़ुबां अब तक तेरी है…’। उनकी इस नज्म ने महिलाओं के ऊपर बहुत गहरा असर डाला। और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी औरतों को कह दिया है- बोल कि लब आजाद हैं तेरे। आज का दिन यकीनी तौर पर मुस्लिम समाज की आधी आबादी के संघर्ष और उसकी खुशी को सलाम करने का है, उसके लिए ईद के जश्न जैसा है। बहुत अलग होता है देख कर कुछ कहना और जी कर कुछ कहना। तीन तलाक की पीड़ा इन औरतों ने भोगी है, इन्हें घर से बेघर किया गया है, सड़कों पर फेंका गया है। सदियों तक दिए जाने वाले धार्मिक हवाले उन्हें डराते रहे हैं और काबू में रखने की कोशिश करते रहे हैं। उनकी तकलीफ किसी ने नहीं सुनी। फिर आखिरकार वे बगावत पर उतर आईं और अब मजहबी हवाले उन्हें डरा नहीं रहे।
भोगी हुई जलालत
इस दौरान जितनी भी पीड़ा मुसलमान औरतों ने मौलवियों की तरफ से झेलीं, इस फैसले के बाद उन्हें माफ करते हुए आगे बढ़ना होगा। अभी इस तरह की कई अमानवीय प्रथाएं हैं, जिनके खिलाफ उन्हें लामबंद होना है। हलाला भी ऐसी ही प्रथा है। दीन के नाम पर चल रहे इस रिवाज की पड़ताल ने मेरी कायनात को झकझोर कर रख दिया। ‘क’ ने बताया कि 15 साल की उम्र में उनका निकाह हुआ था। जैसे ही वह गर्भवती हुईं, पति कहीं भाग गए और फोन करके तलाक बोल दिया। कई साल बाद पति माफी मांगते हुए घर ले जाने लगे तो मौलाना ने कहा- ‘बिना हलाला के ले नहीं जा सकते क्योंकि मरने के बाद कोई कंधा नहीं देगा, जनाजा नहीं उठेगा।’ आखिर उनकी उम्र से बहुत छोटा पड़ोस का एक लड़का लाया गया, जिससे उनका हलाला कराया गया। ‘ख’ के पति ने उन्हें ‘तलाक तलाक तलाक’ कहकर घर से निकाल दिया। मायके में बच्चों के साथ जीना बहुत मुश्किल था। पति दोबारा आए वापस ले जाने। साथ में एक को लाए हलाला कराने के लिए। उस आदमी से ख का निकाह कराया, लेकिन नए पति ने तलाक ही नहीं दिया। वह न इधर की हैं, न उधर की। ‘ग’ एक उच्च शिक्षा प्राप्त टीचर हैं। शादी होते ही उन पर नौकरी छोड़ने का दबाव बनाया गया। न छोड़ने पर एक दिन फोन से तलाक बोल दिया गया। दोबारा ले जाने की शर्त थी हलाला, जिसे ‘ग’ ने अस्वीकार कर दिया। आज तक मायके में रह रही हैं।

ऐसी बहुतेरी कहानियां आपको हर तरफ बिखरी मिल जाएंगी। यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि इस्लाम के नाम पर चल रही हलाला प्रथा दरअसल एक पूर्व-इस्लामी रिवाज है। प्राचीन अरब के अधिकतर बद्दू समुदाय औरतों को भेड़-बकरियों की तरह अपने कब्जे में रखते थे। जब-तब उनकी संख्या हजार दो हजार तक भी होती थी। उन्हें वे जब तक चाहते रखते थे, जब चाहते तलाक-तलाक कह कर निकाल बाहर कर देते थे, और फिर जब चाहते वापस भी बुला लेते थे।
इस्लाम आने के बाद मोहम्मद साहब ने इस प्रथा का विरोध किया। यह बात सामने आई कि औरतों को इस तरह गुलाम बनाकर नहीं रखा जा सकता। जो महिलाएं बेसहारा हैं या जिनके पति युद्ध में मारे गए हैं, उनका यौन शोषण न हो, ऐसी महिलाओं से मर्द बाकायदा निकाह करें और उन्हें उनका पूरा हक दिया जाए। एक औरत को यदि तलाक दे दिया गया है तो तलाक देने वाला बाद में मन बदल जाने पर उसे यूं ही वापस नहीं ला सकता। यह तभी हो सकता है, जब उस महिला का किसी अन्य पुरुष से निकाह हुआ हो और किसी वजह से वहां उसका तलाक हो गया हो।
इसके समर्थन में कुरान (पारा 2 सूरः बकर आयत 230) से भी हवाला मिलता है, जो इस बात की तस्दीक है कि कुरान औरतों को यौन दासी बनाकर रखे जाने का समर्थन नहीं करती। कुरान के ही पारा नंबर 5 सूरः निसां की आयत नं. 3,19,व 24 भी इस बात को लेकर बार-बार आगाह करती हैं कि शारीरिक संबंधों में नाइंसाफी से बचो। पाकदामनी पर कुरान का बहुत ज्यादा जोर है। साथ ही कुरान में सूरः निसां में ही लिखा है कि मोमिनों तुमको जायज नहीं कि जबर्दस्ती औरतों के वारिस बन जाओ, खुद की हदों को पहचानो।
हलाला प्रथा उस समय एक तरह से मर्दों के साथ सख्ती थी कि वे किसी औरत को यौन दासी बनाकर नहीं रख सकते। लेकिन इस प्रथा का आज बहुत ही बुरा इस्तेमाल हो रहा है। जब चाहा तलाक दे दिया, फिर पत्नी को वापस लाने के लिए उसको किसी से निकाह करने और यौन संबंध बनाने को मजबूर किया, फिर उससे दोबारा निकाह किया। हाल में मुरादाबाद, दिल्ली और बिजनौर में कुछ मामले ऐसे पकड़े गए हैं जिनमें मौलवी बाकायदा हलाला सेंटर चला रहे थे।
धर्म का डर
फिक्र की बात यह है कि इसे धर्म का डर दिखा कर स्थापित किया जा रहा है और जो लोग मोटी रकम लेकर हलाला कर रहे हैं, वे भी इसे धार्मिक काम ही मान रहे हैं। गौरतलब है कि तीन तलाक बंद होने से हलाला का सबसे बड़ा आधार समाप्त हो गया है। भारत सरकार को जल्द से जल्द एक ऐसा मुस्लिम कानून बनाने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए, जो भारतीय संविधान के मूल्यों पर आधारित हो और जिसमें महिलाओं के अधिकार सुरक्षित व सुनिश्चित हों। यहां यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि स्त्री विरोधी प्रथाएं किसी एक धर्म तक सीमित नहीं हैं। इस मुल्क में आस्था के नाम पर अमानवीय प्रथाओं को रोकने की नजीरें मौजूद हैं। सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह आदि से जुड़े कानून सफलतापूर्वक लागू किए जा चुके हैं। मुस्लिम औरतें अब उम्मीद कर सकती हैं कि जैसे तीन तलाक पर रोक लगी है, वैसे ही एक दिन हलाला भी बंद हो जाएगा।