देश में आजकल प्रोपगैंडा का दौर चल रहा है। राजनैतिक पार्टियां अपने अपने फायदे के लिए प्रोपगैंडा कर रही है। लेकिन इस मामले में शायद भाजपा कुछ ज्यादा ही बदनाम है और अधिकांशतः कथित उदारतावादियों के निशाने पर रहती है। लेकिन ऐसा लगता है कि देश में उदारतावाद सिर्फ एकतरफा चल रहा है, जो केवल मुस्लिमो के खिलाफ होने वाली किसी छोटी मोटी घटनाओ को भी बड़ा बनाकर हिन्दुओ को बदनाम करने की कोशिश की जाती है वही हिन्दुओ को जब मुस्लिम मारते है तो किसी न्यूज़ चैनेल में कोई ब्रेकिंग न्यूज़ नही होती, कुछ न्यूज़ चैनल जैसे ndtv तो मृतक हिन्दू को ही कटघरे में खड़ा कर देते है|
यूं तो कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर देश के कथित उदारतावादियों को घेरा जा सकता है। लेकिन यहां हम हाल ही में हुई कन्नड़ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के संबंध में बात करेंगे। गौरतलब है कि हाल ही में गौरी लंकेश की हत्या की जांच के लिए गठित एसआईटी ने दो संदिग्धों के स्केच जारी किए थे। लेकिन यहां एक और बात गौर करने लायक थी, जिस पर शायद मीडिया का ध्यान नहीं गया या फिर जान बूझकर इस बात को नजरअंदाज कर दिया गया। वो बात ये थी कि गौरी लंकेश के मर्डर में अभी तक दक्षिणपंथी ताकतों के शामिल होने का कोई सबूत नहीं मिला है।
बता दें कि जिस रात गौरी लंकेश की हत्या हुई थी, उसके तुरंत बाद ही मीडिया और कथित उदारवादियों का जो रिएक्शन था, वो ये था कि गौरी लंकेश की हत्या के पीछे हिंदूवादी संगठन या दक्षिणपंथी ताकतें है। हैरानी की बात है कि बिना किसी सबूत, जांच पड़ताल के गौरी लंकेश की हत्या के बाद दक्षिणपंथी ताकतों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी शुरु हो गए और एक इस तरह का माहौल बन गया, जिसमें गौरी लंकेश के खिलाफ बोलना, एक तरह से गौरी लंकेश के मर्डर को सही ठहराना हो। हालांकि कुछ लोगों ने सचमुच बड़े ही गलत तरीके से गौरी लंकेश की हत्या को सही ठहराने की कोशिश की, जिस पर काफी बवाल भी हुआ था। वह सचमुच गलत है और उसकी आलोचना होनी ही चाहिए।
वहीं इस पूरे मामले पर तुर्रा यह कि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने गौरी लंकेश का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या गौरी लंकेश को सिर्फ इसलिए राजकीय सम्मान दिया गया क्योंकि उनकी हत्या हुई, या फिर उनकी हत्या के पीछे हिंदूवादी संगठनों का नाम आ रहा था। क्या यह कर्नाटक की कांग्रेस सरकार की राजनीति चमकाने की कोशिश नहीं थी ? वही कर्णाटक में रोज आरएसएस के कार्यकर्त्ता मारे जाते है किन्तु उसपर कोई सवाल नहीं खड़ा करता है, आखिर क्यों?
बता दें कि कल ही एक महिला इंजीनियर को लोगों की भीड़ ने सिर्फ इसलिए पीटा, क्योंकि वह गोहत्या का विरोध कर रही थी। एक आर्मी ऑफिसर को गौ तस्करों ने मार डाला, पश्चिम बंगाल में हिन्दू रोज मारे जाते, दीपावली के दिन ही दीपावली मानाने के कारन कश्मीर के हिन्दू परिवारों के मारा पीटा गया धमकी भी दी गई आदि कई घटनाये है लेकिन हैरानी की बात है कि इस तरह के मुद्दों पर कभी कोई उदारवादी अपनी आवाज बुलंद नहीं करता है। यदि कोई ऐसे मुद्दों पर बोलता है तो उसे सांप्रदायिक होने का तमगा दे दिया जाता है और उसके सारे तर्कों को सिर्फ सांप्रदायिकता की तराजू से तौला जाता है। बता दें कि यह हाल सिर्फ कर्नाटक या किसी एक राज्य का नहीं ब्लकि पूरे देश का है। शायद यही कारण है कि देश में उदारवादियों को शक की नजरों से देखा जा रहा है। यदि आप मुस्लिमो के पक्ष में बोलते है, हिन्दुओ पर अभद्र टिप्पणी करते है, हिन्दू देवी देवताओ को अपमानित करते है तो आप सेक्युलर है, परन्तु यदि आप ने एक शब्द भी हिन्दुओ के पक्ष में बोला तो आप भगवा आंतकी है|