SHIV MISHRA JI

कविता-
'
देहरी पर मरी माँ' –(1)
-
शैलेन्द्र चौहान
"याद करने को कहो
तो
कुछ भी याद नहीं
यद्यपि बीते
पैंतीस साल
मैंने देखा
माँ को
मरते हुए
मेरे लिए
हम लोगों के लिए
पाँच भाई-बहनों
के लिए
दिन-रात
पेट काटकर
करते जीवन-संघर्ष
दादी भी
जिंदा थीं जब
मैं रोया मारने पर
बहुत माँ के एक दिन
वह पढ़ा रही थीं जब
मैं बोला
दादी से
तुम्हारा कलेजा
नहीं फट पड़ा
माँ ने मारा मुझे
रोका नहीं, चुपाया नहीं
दादी हँसी थीं बहुत
इस बात को
याद करती रहीं
बहुत दिनों तक
माँ रहने लगीं
गाँव में
दादी ने कहा था
जान अपनी
देहरी पर ही देना
उन्होंने वही किया
जीते-जी दादी भी
नहीं गईं गाँव छोड़कर
विधवा होने के बाद भी
डटी रहीं देहरी पर
वही सीख
उन्होंने बहू को भी दी
पिता जी भी
नहीं टाल सके
अपनी माँ की बात
और मेरी माँ
गाँव में बसीं
तो ऐसी बसीं
नहीं निकलीं
मौत से पहले
वाकया
उस दिन का
न आसमान फटा
न धँसी धरती
रामायण के ऊपर
मिट्टी के तेल का
'
दिया' रख
पढ़ती थीं शायद
चौपाई
या
दोहा
पता नहीं क्या...
पर भगवान रामचंद्र जी ने भी
सहारा न दिया
लगी आग
चल बसीं वह
बारह घंटे
सहती अनंत व्यथा दाह की
बोलीं जुबान से
कुछ नहीं
कुछ भी नहीं
अपने आप में
ज़ज्ब कर ली
माँ ने सारी पीड़ा
क्या इतना सहनशील
कोई और होता है 
माँ के अलावा ?
उस वक्त्त कोई नहीं था
उनके पास
जिनके लिए
वह डटी रहीं
देहरी पर
न मैं,
न पिता, न भाई
देहरी...
देहरी भी क्या
न सोने की न चाँदी की
लोहे की भी नहीं
सड़ी हुई
आम या नीम की
लकड़ी की
गाँव वालों ने
बहुत कोशिशें कीं
छोड़ दें वह देहरी
पर वह भी थीं
धुन की पक्की
जिद्दी बहुत"
"दूध लेने आता था
दूधिया आन गांव से
भैंस पालती थीं माँ
कुट्टी काटतीं
भैंस का गोबर
सानी-पानी
और घर का
शरीर तोड़ू काम
गेहूँ, चावल
रखना, कूटना, छानना
सब करतीं 
अकेली वे
खाना-खुराक
एक-डेढ़ रोटी दोपहर में
और रात की बची
बासी रोटी
सुबह खातीं
बिना सब्जी के
हाँ, चाय पीती थीं
बहुत
नाम के लिए पड़ा
रहता था दूध
यह शौक लगा था उन्हें
पिता जी के साथ रहते-रहते
दूध की बात थी
बढ़ आने सेर
बिकता था तब
और दूधिया वही दूध
बेचता मिलाकर पानी
बाजार में
डेढ़ रुपए सेर
छह आने बचे थे
दूधिया पर
हिसाब से
माँ की मेहनत
और छह आने
सिहर गया मैं
काँपने लगा
गुस्से से
दूधिया छह आने
नहीं देगा...
माँ
पहनतीं फ़टी धोती
बावजूद
पिता थे नौकर
आँत की टीबी हुई
किसी से नहीं कहा
उन्होंने
जब तक
सह सकीं पीड़ा
पर असह्य पीड़ा
छुप न सकी मुझसे
दादी भी नहीं रही थीं
तब तक
कि समझ लेतीं
उनकी बिथा
नीम-हकीमों का इलाज
मर्ज बढ़ता रहा
पैसे भी नहीं थे
उनके पास
सब लगा देतीं
खेती के काम में
कभी खाद
कभी सिंचाई
बटाई पर थी
खेती
वह नहीं समझती थीं
खेती का अर्थशास्त्र
जितना अनाज 
होता
शायद उससे ज्यादा
खर्च होता
और, दिनों-दिन
गलता उनका शरीर
बट्टे में
मैंने कहा- माँ
तुम्हें हम लोगों के लिए
जीना होगा
हम छोटे हैं
हमें कौन सँभालेगा
बड़ी मुश्किल से
वह तैयार हुईं
शहर में इलाज के लिए
मैं बहुत लड़ा
बहुत कहा-सुना
तब उनका
आखिरी गहना
बेच दी मैंने
बड़े अरमान से
उन्होंने रखी थी वह
अपनी बहू की
मुँह-दिखाई के लिए
मैंने कहा
जब तुम ही न रहोगी
तब अरमान कैसे
पूरे होंगे ?
बाद को भैंस भी
हटा दी मैंने
खूँटा खाली हो गया
उनका दिल
भर आया होगा कितना
मैं सिर्फ़
सोच सकता हूँ
पर यह जरूरी था
उनके जिंदा रहने के लिए
उन्हें जी-तोड़ मेहनत से
अलग करने के लिए

स्वास्थ्य सँभला
उन्हें खटकती रही कमी हमेशा
एक भैंस की
हम लोग छुट्टियों में आएँगे घर
तो दूध-घी कैसे होगा....?"

1 comment:

Dear Reader, thanks for commenting.
i always trying to give best knowledge & News for improvement Your Knowledge.
Again thanks for visiting my blog.
DEV JI

देश में आजकल प्रोपगैंडा का दौर चल रहा है। राजनैतिक पार्टियां अपने अपने फायदे के लिए प्रोपगैंडा कर रही है। लेकिन इस मामले में शायद भाजपा कुछ ...